आतिफ रशीद…लॉकडाउन के हीरो है। मदद मांगने वालों से नजर भी नहीं मिलाते, फोटो खिंचना तो दूर की बात। बस चुपचाप खाना पहुंचा देते हैं। ट्विटर पर उनकी खाना बनाते फोटो खूब लोकप्रिय हो रही है। मैंने पूछा, लॉकडाउन में लोगों को खाना खिलाने का ख्याल कैसे आया? तो बोलते हैं लॉकडाउन की पहली रात घर पर हम दो-तीन दोस्त बैठे थे। उसी दौरान यह योजना बनी कि हम लॉकडाउन के दौरान लोगों की मदद करेंगे। लेकिन कैसे? यह बड़ा वाजिब प्रश्न था…जिसका उत्तर भी दोस्तों ने सुझाया। खाना बनाकर….हां-हां खाना बनाकर
लेकिन इतने लोगों का खाना...
आतिफ कहते हैं, हम कुल 10 दोस्त है। हमारी आदत है कि जब हम घूमने जाते हैं तो खाना खुद बनाते हैं। शराब हममें से कोई पीता नहीं, इसलिए जायके के सभी मुरीद है। हम खुद ही हांडी पर बनाकर खाते हैं। सभी दोस्तों की राय थी कि हम खाना बनाकर खिलाएंगे। बस फिर क्या था, हमने अपने एक दोस्त के खाली पड़े मकान के थर्ड फ्लोर पर खाना बनाने के लिए, सेकेंड फ्लोर को डिलीवरी करने वाले पांच दोस्तों एवं ग्राउंड पर मदद मांगने वालों की जानकारी नोेट करने के लिए प्रयोग किया।


सिर्फ वेज ही क्यों
आतिफ कहते हैं, जब सारी तैयारियां हो गई तो हमने एक वीडियो वायरल किया। हाजी कालोनी, गफ्फार मंजिल, जसोला, जाैहरी फार्म, ओखला में वायरल वीडियो में हमने लोगों से कहा कि हम घर पर खाना पहुंचाएंगे। पहले दिन हमनें 100 लोगों का खाना बनाया था, 70 लोगों ने फोन कर खाना मंगवाया। हम प्रोफेशनल नहीं है, इसलिए बहुत टेस्टी तो नहीं बनाते। लेकिन हां, दिन में एक टाइम भरपेट खाना शाम पांच बजे तक पहुंचाते हैं। पहले दिन जो कॉल आए उसमें 16 हिंदू भाईयों के थे। उसी दिन हमनें तय किया कि नॉनवेज नहीं बनाएंगे। हम किसी दिन राजमा चावला, मटर चावल, छोले चावल, सोयाबीन चावल, मिक्स वेज चावल बनाते हैं। हम सुबह 11 बजे से खाना बनाना शुरू करते हैं। खाना बनाकर पहुंचाने में रात आठ-नौ बज ही जाते हैं।

करीब 20 हजार लोगों की मदद
आतिफ कहते हैं कि पहले दिन 70 लोगों के फोन आए, अगले दिन 300 लोगों ने फोन किया। लेकिन एक हफ्ते के अंदर ही प्रतिदिन 600 लोगों का फोन आने लगा। संख्या तो अभी भी रोज ही बढ़ रही है लेकिन हमारी अपनी कुछ सीमाएं है। हमने पास इन्हीं इलाकों का बनवाया है। हम दस ही लोगों का समूह है। हम किसी से कोई चंदा नहीं लेते। तीन दोस्तों ने पैसा लगाया है जबकि बाकि दोस्त शारीरिक श्रम दे रहे हैं। मेरा विचार है कि शारीरिक श्रम पैसे से कहीं ज्यादा कीमती है। वो भी इस समय, जब घर की दहलीज लांघन में भी खतरा है।

आंखें नहीं मिलाते
हमसे मदद मांगने वाले 95 फीसद लोग सम्पन्न घराने से हैं। वो सिर्फ हालात से मजबूर है। करीब 200 जामिया के छात्र है जो अपने किसी दोस्त या जानकार के घर फंसे हुए है। इसमें इंजीनियरिंग, एमबीए, एमएसडब्ल्यू, लॉ आदि करने वाले छात्र है। इनका कहना है कि रोज बिस्कुट और मैगी खाकर बीमार हो रहे हैं। हम इन तक खाना पहुंचाते हैं, लेकिन चूंकि ये खुद्​दार लोग है, इसलिए हम आंख नहीं मिलाते। सिर्फ मकान के नीचे पहुंच जाते हैं, फोन कर देते हैं। ये उपर से रस्सी लटकाते हैं, हम खाना देकर चले आते हैं। एक बार हम एक गली में एक मदद मांगने वाली महिला का पता किसी से पूछ रहे थे। महिला ने कहा कि आप हमारे पड़ोसी से ही मेरा पता पूछ रहे थे। उन्हेें पता चल जाएगा…मैं आपसे खाना नहीं ले सकती। उसके बाद से हम ऐसे लोेगों के घर के दरवाजे पर खाना, राशन की थैली टांग देते और फोन करते…..ऊपर वाले ने आपके लिए राशन भेजा है।

हिंदू-मुस्लिम सभी मिलकर मदद कर रहे
हम जिन्हें खाना पहुंचाते हैं, वाे हमारी मदद कर रहे हैं। एक छात्र ने एक दिन हमसे कहा कि वो मदद करेगा। हमने कहा कि ठीक है, आपकी कालोनी में हम कुल 11 छात्रों को खाना देने आते हैं। अब सरिता विहार में आपको दे देंगे, आप बाकि छात्रों तक पहुंचा देना। इसी तरह जुलैना में एक परिवार मदद को आगे आया। हमनें उनसे भी कहा कि आप बाकियों तक खाना पहुंचाकर मदद कर सकते हैं।
बकौल आतिफ यह मुश्किल दौर है। लेकिन हम मिलकर सामना करेंगे तो कट जाएगा।

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