दिल्ली की वो दुकान, जहां रात के तीन बजे जाते थे इरफान खान

फिल्म अभिनेता इरफान खान की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी की ही मानिंद थी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय में प्रशिक्षण प्राप्त इरफान के सहपाठियाें की मानें तो क्लास में सबसे दुबले-पतले थे। बहुत ज्यादा बातें नहीं करते थे लेकिन हां, एक बार दोस्ती हो गई तो यारों का यार थे। दोस्तों के सुख दुख में शामिल होते थे। उनके हाथों में दो ही चीजें दिखती थी, या तो स्क्रिप्ट या फिर किताब। दिल्ली में आईटीओ चौक का पराठा उनका फेवरिट था। एनएसडी में प्रशिक्षण के दौरान ही बैचमेट सुतापा सिकदर से अफेयर हुआ एवं फिर दोनों ने शादी कर ली थी।

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आईटीओ का पराठा पसंद
एनएसडी के बैचमेट विपिन कुमार बताते हैं कि हमारा 1987 का बैच था। 84 में दाखिले के बाद जब पहली बार इरफान से रूबरू हुआ तो वो बहुत ज्यादा बोलते नहीं थे। शांत रहते थे। अक्सर किताबें पढ़ते मिलते। लेकिन धीरे धीरे फिर हमारी दोस्ती हो गई। वो कक्षा का सबसे दुबला पतला छात्र था। मोटा होने के लिए वो खूब इक्सरसाइज करते थे। बटर और देशी घी भी खूब खाते थे। उनकी मां भी हर महीने देशी घी भेजती थी। हम उन्हें बटर, घी कहकर चिढ़ाते भी थे। उन्हेें नॉनवेज भी पसंद था। एक बार हम बिरयानी खाने पुरानी दिल्ली के करीम होटल गए थेे। बाद में हमें हिमाचल भवन का टेस्ट अच्छा लगा और फिर हर शनिवार हम तीन दोस्त मैं, इरफान और ऑलोक चटर्जी यहीं खाना खाने जाते। सीपी घूमना हमें पसंद था। सिनेमा देखने जाते रहते थे। इसके अलावा मंडी हाउस पर नाटक हम खूब देखते थेे। हां, अक्सर रात के एक बजे इरफान हमारा दरवाजा खटखटाते। बोलते, यार नींद नहीं रही है। आओ, गप्पे मारकर आते हैं। हम बातें करते करते आईटीओ तक जाते एवं यहां चाय पीते हुए पराठे का स्वाद चखते। ऐसा लगभग हर कुछ दिन के बाद होता ही रहता था।


हाथों में स्क्रिप्ट होती थी
एनएसडी में चूंकि अभिनय का प्रशिक्षण ले रहे थे, इसलिए नाटक खूब होते थे। इरफान अपने नाटकों का खूब रिहर्सल करते थे। उनके हाथों में स्क्रिप्ट हमेशा होती थी। जैसा बाकि संस्थानों में होता है कि दोस्त, यार मिलकर बैठते हैं। मस्ती करते हैं। यहां भी छात्र करते थे लेकिन इरफान को मानों कम समय में सब कुछ हासिल करने का जुनून सवार था। वो हर लम्हेें का उपयोग अपने व्यक्तित्व निखारने के लिए करते थे। इसलिए पढ़ाई भी खूब करते थे, लेकिन हां, दोस्तों के साथ रहते जरूर थेे।


बैचमेट बनी जीवनसंगिनी
विपिन कहते हैं कि सुतापा चितरंजन पार्क कीरहने वाली थी। हांलाकि एनएसडी हास्टल में ही रहती थी। इरफान जितने शांत रहने वाले थे, सुतापा उतनी ही चंचल। दोनों के अफेयर की बातें हमें सेकेंड ईयर में पता चली। बाद में हम सब की मौजूदगी में दोनों ने दिल्ली में ही 1995 में शादी भी कर ली थी। खुद सुतापा ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में बताया कि वो अक्सर एनएसडी के दोस्तों को अपने घर खाना खिलाने ले जाती थी। वहां बाकि दोस्त तो खाना खाते लेकिन इरफान, मेरे भाई की लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ता रहता। किताबों, फिल्मों पर बातें खूब करतेे।


हड़ताल भी किया
विपिन कहते हैं, इरफान बहुत चूजी थे। हमारे बैच की डिमांड बहुत होती थी। हम सब ने 1985 में दो बार स्ट्राइक की। कारण, हम पढ़ाने के लिए टीचर मांग रहे थे। हालांकि स्ट्राइक लंबी नहीं चली। हमें टीचर मुहैया करा दिए गए थेे। लेकिन हां, यदि अध्यापक हमारी पसंद के नहीं होते थे तो हम बॉयकाट भी कर देते थे।


बेमिसाल रंगकर्मी
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही इरफान ने कई नाटक किए। थर्ड ईयर में सूरज का सातवां घोड़ा में उनका अभिनय बेमिसाल था। प्रभारी निदेशक प्रो सुरेश शर्मा कहते हैं कि छात्र जीवन के दौरान इरफान द्वारा अभिनीत कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तुतियां थी, कार्लो गोल्डोनी कृत फैन, मैक्सिम गोर्की का नाटक लोअर डेप्थस, ज्यां आनुई का लड़ाकू मुर्गा तथा रूसी नाटककार की रचना एसेंट ऑफ फ्यूजीयामा। सभी प्रस्तुतियों में इरफान ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया।

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