तजामुल की उम्र करीब 8 साल थी जबकि उनके भाई मुजामिल पाशा की 5 साल। जब दोनों भाईयों के सिर से मां-बाप का साया उठ गया। दादी के साथ रहने के लिए दोनों भाई कोलर चले आए। दो वक्त रोटी के जुगाड़ का नतीजा था कि कक्षा चार के बाद पढ़ाई भी नहीं हो पायी। लेकिन यही वो वक्त था जिसने असल भारत की पहचान कराई। मुजामिल मीडिया से बताते हैं, एक दयावान व्यक्ति ने हमें रहने के लिए घर दिया। क्या हिंदू, क्या मुस्लिम और क्या सिख, ईसाई। जाति-धर्म के बंधनों में ना पड़कर लोगों ने हमें खाना खिलाया। उन दिनों नेे हमें भोजन का महत्व सिखाया। वही अनुभव आज हमारी प्रेरणा है।

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बेच दी जमीन
लॉकडाउन शुरू हुआ तो दोनों भाईयों के दिमाग में एक बात आयी। वो ये थी कि लॉकडाउन में गरीबों को खाना कैसे मिलेगा? बस फिर क्या था, गरीबों के पेट में निवाला जाए, इसके लिए भाईयों ने वहीं कोलर स्थित अपनी जमीन बेच दी। जमीन 25 लाख रुपये में बिकी। इसके बाद दोनों भाईयों ने पड़ोसियों की मदद से राशन इक्टठा किया, पास ही एक टेंट लगाया। यहां राशन किट तैयार किया गया, जिसमें दस किलो चावल, दो किलो आटा, एक किलो चीनी, चायपत्ती, मसाला, हैंडसेनिटाइजर और मास्क शामिल किया गया। जबकि टेंट में ही खाना भी तैयार किया जाता। जिसे बना बनाया खाना चाहिए, उसे यहीं से खाना पैककर दिया जाने लगा। अब तक दोनों भाई 2800 परिवारों को राशन बांट चुके हैं। जबकि करीब 2000 लोगों को खाना खिला चुके है। बेंगलुरू स्थित कोलर की यह स्टोरी डेक्कन हेराल्ड, बीबीसी ने भी कैरी किया है। उम्मीद है, भारत के अन्य हिस्सों में भी लोग इस खबर से प्रेरणा लेंगे।

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