दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल….रविवार को प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। काफी कुछ बता रहे थे, लेकिन जो एक बात उन्होंने बताई वो दिल्ली ही नहीं पूरे देश को चिंता में डालने वाली है। दरअसल, दिल्ली में बिना लक्षण वाले कोरोना मरीज यानी एसिम्टोमैटिक पेशेंट मिले हैं। इस पर रिसर्च शुरू किया ही था कि तभी एनडीटीवी की एक खबर ने हैरान कर दिया। खबर, आईसीएमआर के एक वैज्ञानिक के हवाले से थी, जिन्होंने कहा कि भारत में करीब 80 फीसद मरीज एसिप्म्टोमैटिक पाए गए हैं। अभी पोस्ट लिख रहा हूं, कुछ लाइनें लिख चुका हूं कि तभी हमारे साथी रिपोर्टर विनीत त्रिपाठी का ने वाट्सएप ग्रुप पर एक वेब लिंक शेयर किया। यह द हफिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट थी, जिसमें बताया गया है कि मुंबई में 53 पत्रकार कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। विगत एक दिनों के अंतराल में सामने आयी यह तीनों खबरें क्या भारत के लिए खतरे की घंटी है? क्या यह अब तक किए गए प्रयासों पर पानी फेर सकती है?
सबसे पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की प्रेस कांफ्रेंस पर गौर फरमाते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि देश की कुल 2 फीसद जनसंख्या दिल्ली में रहती है, लेकिन देश में आए कोरोना के कुल मामलों में से 12 फीसद मरीज दिल्ली में मिले है। पिछले दिनों से दिल्ली में कोरोना के केसों में बढ़ोतरी हुई है। बकौल केजरीवाल, 18 अप्रैल को हमारे पास 736 केसों के टेस्ट की रिपोर्ट आई, उनमें 186 कोरोना संक्रमित पाए गए। ये मरीज एसिप्म्टोमैटिक (बिना लक्षण वाले ) हैं। इनमें खांसी, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ जैसे कोई लक्षण भी नहीं थे, लेकिन जांच में ये पॉजिटिव मिले हैं। दिल्ली में ऐसे बहुत लोग कोरोना लेकर घूम रहे हैं। यह स्थिति बहुत ही खतरनाक है। कई बार लोगों को पता भी नहीं चलता है कि उन्हें कोरोना है। जिसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है वह घूमकर कोरोना फैलाता रहता है। जिसकी क्षमता कम होती है उसमें यह संक्रमण पहले हो जाता है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि एक व्यक्ति से जब हमने बात की, तो उसने बताया कि वह दिल्ली सरकार द्वारा संचालित किए जा रहे अलग-अलग फूड सेंटरों में जाकर खाना बंटवाने का काम कर रहा था। हम सोच सकते हैं कि उसने अभी तक कितने लोगों को प्रभावित कर दिया होगा। उन्होंने कहा कि मैंने उन सभी फूड सेंटरों में जांच का आदेश दिया है। सेंटर पर प्रतिदिन लगभग वही लोग आते होंगे, जो रोज खाना खाते हैं। उन सभी की रैपिड टेस्ट कराएंगे। दिल्ली में हमारे जितने भी फूड सेंटर हैं, उन सभी में खाना बांटने वाले सभी वालंटियर और कर्मचारियों का रैपिड टेस्ट करेंगे।
अब एनडीटीवी की खबर का जिक्र करते हैं। आईसीएमआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक रमन आर गंगाखेडकर ने एनडीटीवी को दिए साक्षात्कार में बताया कि कोरोना के 80 प्रतिशत मामलों में संक्रमण के लक्षण नहीं दिखे। यह हमारे लिए चिंता का विषय है। अब बात मुंबई की करते हैं। यहां बीएमसी ने 167 पत्रकारों का टेस्ट किया, जिसमें 53 पत्रकारों को संक्रमण की पुष्टि हुई। यह संख्या अभी और भी बढ़ सकती है, क्यों कि कईयों की रिपोर्ट आनी बाकि है। इन पत्रकारों में से अधिकतर में किसी तरह के कोई लक्षण नहीं दिखे थे। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कितना बड़ा खतराा है। लेकिन आखिर ऐसा कैसे हो रहा है? आमतौर पर कोविड 19 के लक्षण 1 से 3 दिन में दिखते हैं। फिर भारत में, लक्षण क्यों नहीं दिख रहे। इसका जवाब बीबीसी की एक रिपोर्ट में सवाई मानसिंह अस्पताल के एमएस डॉ एमएस मीणा देते हैं। कहते हैं, भारतीयों का रहन-सहन, भौगोलिक स्थितियां इसके लिए जिम्मेदार है। हमारा प्रदेश गर्म है, हम गर्म खाना खाते हैं। गर्म पेय पीते हैं। इस वजह से हमारे यहां एसिप्म्टोमैटिक मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं। बकौल मीणा, कोरोना वायरस हीट सेंसेटिव है। लेकिन मीणा की इस बात में भी एक और बड़ा खतरा छिपा हुआ है और वो ये है कि भारत में जो ये बिना लक्षण वाले मरीज है वो युवावस्था वाले ज्यादा है। ये बिना लक्षण वाले मरीज स्वाभाविक है कि अपना टेस्ट नहीं कराएंगे। इन्हें पता ही नहीं चलेगा कि ये कोरोना फैलाते चले जाएंगे। जैसी चिंता दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भी जताई है। फिर समाधान क्या है? रैपिड टेस्टिंग और पूल टेस्टिंग से थोड़ी मदद जरूर मिलेगी लेकिन युवाओं को खुद का ध्यान देने की जरूरत है। 4 अप्रैल को केंद्र सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 20 से 49 की उम्र के बीच 41.9 फीसद लोग कोरोना पॉजीटिव है। 41-60 साल की उम्र वाले तकरीबन 32.8 फीसद कोरोना पॉजीटिव है। इन आंकड़ों से साफ था कि युवा ही सबसे ज्यादा संक्रमण की चपेट में आया है।

https://en.wikipedia.org/wiki/2020_coronavirus_pandemic_in_India
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