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covid-19 कैसी होंगी गर्मी की छुट्टियां, या फिर कुछ साल
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covid-19 कैसी होंगी गर्मी की छुट्टियां, या फिर कुछ साल 

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जब ये पोस्ट लिख रहा हूं तो कानों में कोयल की कूक सुनाई दे रही है। बालकनी के ठीक पास स्थित छोटे से पार्क में गौरेया फुदक रही है। पेड़ों की हरी मखमली पत्तियां हवा के झोंको संग खेल रही हैं। हवा मानों दोनों बाहें फैलाकर सोसायटी के एक टाॅवर से दूसरे टॉवर तक दौड़ लगा रही हो। और कबूतर तो खबरनवीस ही बन गया है। बालकनी में लोहे की रॉड पर गुटर-गुटर करते हुए मानों यह बताने की कोशिश कर रहा है कि बाहर का माहौल बहुत अच्छा है। लेकिन यह सब देखने, सुनने के बीच जब ढाई साल की मेरी बेटी आकर मेरी अंगुली पकड़कर साथ खेलने की जिद करती है तो सोचता हूं कि कोरोना के खिलाफ जंग कितनी लंबी चलेगी? गर्मी की छुट्टियां कैसे गुजरेंगी? अगामी कुछ महीने, या कुछ साल क्या इसी तरह घर में रहकर गुजारने पड़ेंगे? क्या मनुष्य अब सामाजिक प्राणी नहीं रह पाएगा? 

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क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का स्वागत समारोह ही अगले कुछ सालों में याद किया जाने वाला आखिरी समारोह होगा? इन सारे सवालों के जवाबों के पहले यह जानना जरूरी है कि कैसे परिस्थितयां बदली। जनवरी महीने की 30 तारीख को भारत में COVID-19 का पहला केस आया। जो 3 फरवरी तक बढ़कर 3 पहुंच गया। ये सभी मामले केरला में सामने आए थे और पीड़ित सभी छात्र थे जो चीन के वुहान से लौटे थे। यह वही क्षेत्र है जहां से कोविद-19 फैला। भारत ने तत्काल कोरोना पर लगाम कसनी शुरू कर दी। जिसका नतीजा था कि फरवरी महीने में कोरोना संक्रमण का एक भी मामला नहीं आया। इस बीच 24-25 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आए। बौद्धिक तबके द्वारा यह आरोप लगाया जाना कि भारत सरकार ट्रंप के स्वागत में उलझी रही और कोरोना ने पांव पसार दिया, शायद आंकड़ों के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। ट्रंप आए, चले भी गए लेकिन कोराेना संक्रमण का मामला न तो बढ़ा ना ही नए मामले सामने आए। लेकिन अचानक 4 मार्च को एक ही दिन में कोरोना संक्रमण के 22 नए मामले सामने आए। इसमें इटली के वो 14 पर्यटक शामिल थे जो 22 सदस्यी उस दल का हिस्सा थे जो भारत भ्रमण पर निकला था। इसी दिन दिल्ली के एक परिवार के छह सदस्यों में संक्रमण की पुष्टि भी हुई। इस परिवार के एक सदस्य को कुछ दिन पहले ही संक्रमण हुआ था, जिससे बाकि सदस्य भी संक्रमित हुए। 12 मार्च को कोरोना से भारत में पहली मौत हुई। एक 76 वर्षीय बुजुर्ग की जो हाल ही में सउदी अरब से लौटे थे। इसके बाद 15 मार्च तक भारत में संक्रमण का आंकड़ा 100 तक पहुंच गया। जो अगले महज 13 दिनों में 1000 जा पहुंचा। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर 22 मार्च के जनता कर्फ्यू का पूरे देश ने स्वेच्छा से पालन किया। शाम के समय अपनी बालकनी में खड़े होकर पूरे देश ने तालियां भी बजाई और थाली, शंख भी। इस दिन भी सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाजार गर्म रहा। 
खैर, यह वो महीना था जब सरकार भले ही सक्रिय थी लेकिन लोगों में भारतवासी होने का दंभ था। मसलन, कई तरह के जोक सोशल मीडिया पर फैल रहे थे। जिनका लब्बोलुआब कुछ ऐसा था–
-भारतवासियों का इम्यून सिस्टम ठीक होता है, कोरोना हो ही नहीं सकता।
-थाली बजाने, शंख बजाने से कोरोना मर जाएगा।
-यहां इतनी गर्मी पड़ती है, कोरोना मर जाएगा आदि-आदि।
कनिका कपूूर जो कभी दिलों पर राज करती थी अचानक मीडिया में खबरें आयी और विलेन ही बन गई। खैर, मार्च में प्रधानमंत्री ने 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की। इस घोषणा के बाद भारत में लोगों को समझ आया कि अब हालात बिगड़ चुके हैं। बावजूद इसके भारत में रामायण के बाल कांड में मिले बाल का पानी पीने से कोरोना का इलाज, घर की चौखट पर दीपक जलाने, दायें पैर के अंगुठे पर हल्दी लगाने से काेरोना का इलाज का दावा किया गया। लॉकडाउन शुरू हुआ तो दिल्ली के जरिए देश ने जो देखा वो शर्मनाक था। कहा जाता है कि दिल्ली दिलवालों की है लेकिन यहां इस कदर अफवाह फैलाया गया( कालोनी में माइक पर बसों के जरिए लोगों को यूपी भेजने संबंधी घोषणाओं का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए गए) कि हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर गए। हालांकि इसके पीछे एक अन्य वजह थी। दरअसल, रेलवे ने एक हफ्ता पहले से ही ट्रेनों का पालन बंद कर दिया था। इस महीने यूपी, बिहार समेत अन्य राज्यों के लोग अपने पैतृक निवास जाते ही है। क्यों कि ये फसलों की कटाई का सीजन होता है, इसके बाद अप्रैल में शादी ब्याह होते हैं। एवं फिर जुलाई में बुवाई आदि के बाद लोग वापस दिल्ली आते हैं। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि लोग दीपावली तक दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में वापस लौटते हैं।
खैर, अप्रैल महीने की 7 तारीख तक भारत में 5000 मामले सामने आए जबकि इसके बाद 14 अप्रैल तक यानी महज 7 दिनों में ही मामले बढ़कर 10,000 हो गए। मृतकों का आंकड़ा भी 10 अप्रैल तक 100 पहुंचा एवं अगले कुछ दिनों में यानी 18 अप्रैल तक संक्रमितों की संख्या 14378 एवं मृतकों का आंकड़ा 480 पहुंच गया। हांलाकि 1992 लोग स्वस्थ्य भी हुए। इन लोगों ने कोरोना को मात दी। तब्लीगी मरकज से निकले लोग जो पूरे देश में गए तो संक्रमण का खतरा ना केवल बढ़ गया बल्कि मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई। अकेले दिल्ली में कोरोना संक्रमण के कुल मामलों में करीब 60 फीसद लोग मरकज से जुड़े हैं।
अप्रैल में 14 तारीख को लॉकडाउन पार्ट 1 खत्म हुआ तो प्रधानमंत्री ने इसे दो सप्ताह से ज्यादा दिन यानी 3 मई तक बढ़ा दिया। अब ये सवाल उठना लाजमी है कि गर्मी की छुट्टियों का क्या?

कैसे गुजरेंगी गर्मी की छुट्टियां
पूरा देश लॉकडाउन है। लोग घरों की दहलीज के अंदर है तो यह सवाल उठना लाजमी है कि अगले कुछ महीने या कुछ साल कैसे गुजरेंगे। गर्मी की छुट्टियों का क्या? यह छुट्टियां मौज मस्ती के लिए जानी जाती है। लेकिन इस बार शायद यह छुट्टियां घरों में ही गुजरे? इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ के के अग्रवाल से जब पूछा गया कि लॉकडाउन के बाद का भारत कैसा होगा? तो उनका जवाब था। यह सरकारी लॉकडाउन खत्म होगा….हम लोगों का लॉकडाउन तो अगले कई महीने तक चलेगा। या यूं कहें कि दो साल तक चलेगा? उसके बाद तो आदत सी पड़ जाएगी। बकौल अग्रवाल लॉकडाउन बढ़ेगा या अगले महीने सरकार क्या कदम उठाएगी? यह काफी हद तक लॉकडाउन खत्म होने के बाद लोगों की आवाजाही पर निर्भर करेगा। ऐसा अनुमान है कि लॉकडाउन खत्म होते ही करीब एक करोड़ माइग्रेंट सफर करेंगे? यह बहुत बड़ी संख्या है। सरकार को हर कदम बहुत फूंक कर रखना होगा। शारीरिक दूरी का पालन 2022 तक करना पड़ सकता है। साइंस जनरल में प्रकाशित एक रिपोर्ट भी यही कहती है। रिपोर्ट की मानें तो एक बार का लाॅकडाउन कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। संक्रमण का दूसरा काल ज्यादा मामलों का गवाह बन सकता है यदि शारीरिक दूरी आदि के नियंत्रण का पालन न किया गया तो। हार्वर्ड में महामारी विज्ञान के एक प्रोफेसर और अध्ययन के सह लेखक मार्क लिप्टिच कहते हैं कि संक्रमण तब फैलता है जब दो चीजें होती है: संक्रमित लोग और अतिसंवेदनशील लोग। संक्रमण के प्रसार को देखते हुए 2020 की गर्मियों में इसका खत्मा का अनुमान सही नहीं माना जा सकता। फिर भारत के सामने क्या विकल्प है?

लॉकडाउन खत्म करना
नोटबंदी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था काफी प्रभावित हुई। ऐसे में यह तो साफ है कि लॉकडाउन जितना लंबा खिंचेगा, अर्थव्यवस्था को नुकसान उतना ही ज्यादा पहुंचेगा। तो उम्मीद है कि 3 मई के बाद लॉकडाउन हटा लिया जाए। क्यों कि भारत की स्थिति इस समय आगे कुआं, पीछे खाई वाली है। लेकिन लॉकडाउन हटा लेने के बाद संक्रमण के मामलों के तेजी से फैलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में क्या हो सकता है? विशेषज्ञों की नजरों में एक उपाय यह है कि चिन्हित किए गए हॉटस्पॉट को ही सील किया जाए। बाकि जगहों से लॉकडाउन हटाया जाए। लेकिन बाजारोंं समेत सार्वजनिक स्थलों पर भीड़ उमड़ी पड़ी तो? यह चिंता लाजमी है। अगर, लॉकडाउन हटे लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर धारा 144 लगाया जाए तो? यह संभव दिखता है कि सरकार लोगों से अपील करे कि वो घर से आफिस एवं फिर घर ही आए। सार्वजनिक स्थलों पर जमावड़ा ना हो। तो आखिर यह सब कब खत्म होगा? कब हम पहले की तरह जिंदगी गुजारेंगे? मुझे लगता है कि इस समय तो सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि हम क्या करेें कि मामले कम ही रहें? वैसे भी लॉकडाउन बीमारी रोकने का एक तरीका भर है, यह कोई दवा नहीं है। हां, इसका उपयोग टेस्टिंग के लिए किया जा सकता है। जैसा विपक्षी दल भी कह रहे हैं। लेकिन क्या भारत में टेस्टिंग कम है? आईसीएमआर के आंकडे कहते हैं कि एक पॉजीटिव केस सामने आने पर भारत में 24 लोगों का टेस्ट किया जाता है जो जापान में 11.7, इटली में 6.7, अमेरिका में 5.3 फीसद है। ऐसे में यह कहना कि भारत में कम टेस्ट होते हैं, शायद उचित ना हो। तो भारत को क्या सिंगापुर, ताइवान, हांगकांग से सीखना चाहिए। हां, काफी हद तक। इन देशों ने कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए अच्छे कदम उठाए हैं।

संसाधन मुहैया कराना
हां, यदि लॉकडाउन खत्म होता है तो संसाधनों की जरूरत होगी। मसलन, मॉस्क, सेनिटाइजर आदि। हमें शारीरिक दूरी का ध्यान रखना होगा। पीएम नरेंद्र मोदी ने घर में बने मास्क पहनकर ही बाहर निकलने की गुजारिश की है। लोग घरों में मास्क बना भी रहे हैं लेकिन क्या ये सुरक्षित है। मॉस्क पहनने से खांसी, छींकने यहां तक बोलते समय बूंदों के फैलने का खतरा कम होता है। चाइनीज सेंटर फॉर डीसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के महानिदेशक जार्ज गऊ ने पिछले हफ्ते एक इंटरव्यू में कहा था, मेरे विचार में यूएस और अमेरिका में जो सबसे बड़ी गलती की जा रही है वो यह कि लोग मॉस्क नहीं पहन रहे हैं। यह वायरस बूंदो और संपर्क में आने के कारण होता हे। खासी के दौरान निकली बूंदे महत्वपूर्ण होती हे क्यों कि जब भी आप बोलते हैं तो मुंह से थूक निकलता है। इसलिए मास्क पहनने की आवश्यकता है। बहुत से लोगों को एसिम्प्टोमैटिक या प्रीसिम्पटिक संक्रमण हेाता है। यदि वे चेहरे पर मास्क पहन रहे हैं तो यह उन बूंदों को रोक सकता है जो वायरस को फैलाता है। ऐसा चेक गणराज्य में दिखा भी है। यहां एक मार्च को तीन मामले सामने आए थे। 12 मार्च को सरकार ने आपातकाल की घोषणा की, अपनी सीमाएं बंद कर दी और देशव्यापी कर्फ्यू लगा दिया। 18 मार्च को मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया। इन उपायों को पहले 24 मार्च एवं फिर 1 एवं 12 अप्रैल तक बढ़ाया गया। यहां तीन चीजों से संक्रमण का प्रसार कम करने में सफलता हाथ लगी। पहला, सीमाओं को जल्दी बंद करना। दूसरा, दुकानें बंद करना, सार्वजनिक स्थल पर जमावड़ा रोकना और तीसरा मॉस्क अनिवार्य करना। यहां आवश्यक कार्य और बाहर दो से अधिक लोगों के मिलने पर मनाही है। क्लॉथ मास्क कणों को 97 प्रतिशत तक प्रवेश की अनुमति देते हैं जबकि मेडिकल मास्क 44 प्रतिशत कणों की अनुमति देते हैं. अध्ययन में यह भी पाया गया कि नमी और मास्क का फिर से उपयोग संक्रमण की संभावना को बढ़ाता है. इसके अलावा, नमी से मैलापन की संभावना भी बढ़ जाती है.

हॉवर्ड ने अपने पहले के ओपिनियन लेख में लिखा था कि ‘यह सच है कि मास्क दूषित हो सकते हैं. लेकिन बेहतर यह है कि मास्क ही दूषित होता है उसको पहनाने वाला व्यक्ति नहीं. किसी मास्क को धोना या हटाना मुश्किल नहीं होता है और फिर किसी दूषित मास्क के संक्रमित होने से रोकने के लिए हाथों को अच्छी तरह से धोना चाहिए.इस संबंध में भारत सरकार ने भी दिशा निर्देश जारी किए हैं। कहा गया है कि सूती मॉस्क 70 फीसद प्रभावी है।

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5 Comments

  1. Unknown

    Now this time situation is beyond the thinking of men.
    Anything could happen .
    Supereb thought Sanjeev ji.

  2. Shailesh Kumar

    very well written and explained. 🙂

  3. Unknown

    सामयिक, सटीक और सार्थक लेख, साधुवाद

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