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Lockdown Hero-दिल्ली का दिलदार दानवीर
दिल्ली, शख्सियत

Lockdown Hero-दिल्ली का दिलदार दानवीर 

भैया…हम लोग महाराष्ट्र में फंसे हैं, राशन खत्म हो गया है। कई दिन से कुछ नहीं खाया है।
तेजिंदर जी…बिहार के कई मजदूर दिल्ली में फंसे हैं, कृपया मदद करें।
बग्गा जी…मेरे पिता की दवाई खत्म हो गई है, वो दिल के मरीज है, बहुत जरूरी है, कृपया मदद करें।
तेजिंदर पाल सिंह बग्गा के ट्विटर अकाउंट पर इस तरह के संदेशों की भरमार है। भारत के लगभग हर कोने से लोग मदद की गुहार लगाते हैं और बग्गा बड़ी खुशी खुशी उन तक खाद्यान्न, दवाइयां आदि पहुंचा रहे बग्गा की निस्वार्थ सेवा ने सियासी खाई भी पाट दी है। बिहार के सैकड़ों मजदूरों को राशन उपलब्ध कराने पर राजेडी नेता तेजस्वी  तेजप्रताप भी बग्गा का आभार जता चुके हैं एवं बिहार श्रृणी रहेगा सरीखी लाइनें लिख चुके हैं। लेकिन इतने लोग तक मदद पहुंचाने का यह यह सिलसिला शुरू कैसे हुआ ! बग्गा कहते हैं कि जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो पहले दिन 3-4  लोगों ने मदद मांगी, मैंने मदद कर दी उस समय मुझेे खुद भी नहीं पता था कि इतने लोगों की मदद कर पाऊंगा। पहले हफ्ते में ही एक समय प्रतिदिन 300-400 लोगों के कॉल आने लगे। मैं मदद करने लगा और हमारा कारवां भी बढ़ता गया। मेरी फिलॉसपी है कि कोई मदद मांग रहा है तो उसकी हर हाल में मदद होनी चाहिए। क्यों कि कोई यूं ही मदद नहीं मांगता है। तो हुआ यूं कि लोग ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सएप पर मदद मांगते और मैं उन तक राशन पहुंचाने की जुगत में जुट जाता। कई दिनों तक मैं ठीक से सोया नहीं। दिन में 20 घंटे तक लगा रहा। आंखें सूज गई थी। जहां बीजेपी कार्यकर्ताओं के जरिए मदद पहुंचा पाता वहां कार्यकर्ताओं की मदद लेता नहीं तो संघ, पतंजलि और आर्ट आफ लिविंग की मदद लेता। लेकिन मदद पहुंचती जरूर थी। देश का ऐसा कोई कोना नहीं, जहां हम लोगों ने इस एक मॉह के दौरान मदद ना पहुंचायी हो।

source- google


अब तक एक डेढ लाख से ज्यादा की मदद
यह थोड़ा अटपटा सवाल था लेकिन बग्गा कहते हैं कि इस तरह का कोई हिसाब तो नहीं रखता। हां, प्रतिदिन मैं 200 लोगों को अपने सोशल मीडिया अकाउंटस पर रिप्लाई दे पाता हूं। मदद मांगने वालों में 5 सदस्यी परिवार से लेकर 200 लोगों का समूह तक शामिल होता है। प्रतिदिन करीब पांच हजार लोग हमसे जुड़ रहे हैं। जो एक महीने में डेढ़ लाख बैठता है।

जब बग्गा रो पड़े
इस एक माह के दौरान ऐसे कई वाकये आए जब आंखें डबडबा गई। ऐसा ही एक वाकया बग्गा बताते हैं कि अमेरिका के एक व्यक्ति ने ट्वीट किया। लिखा कि उनके दोस्त अहमदाबाद में रहते हैं। पति-पत्नी दोनों कोरोना पॉजीटिव पाए गए हैं। उनका पांच साल का बच्चा है, जिसकी इस समय देखभाल करने वाला कोई नहीं। बकौल बग्गा, मैंने तत्काल उनसे बात की। पता चला कि बच्चा अस्पताल के एक स्टॉफ की गाड़ी में अस्पताल के बाहर मौजूद है। मैंने अहमदाबाद में अपने एक दोेस्त को मदद करने के लिए कहा। बाद में बताया गया कि बच्चे के एक रिश्तेदार भावनगर से तो रहे हैं लेकिन उनकी सोसायटी वाले बच्चे के साथ उन्हें शायद ही प्रवेश दें? मैंने उनसे बातचीत कर यह भरोसा दिलाया कि मैं सोसायटी के प्रेजिडेंट से बात करुंगा। खैर, आखिरकार उनकी मदद हो गई।

खो-खो खिलाड़ी की मदद
टीवी 9 के पत्रकार मानव ने एक ट्वीट किया था। जिसमें मुझे टैग किया गया था। ट्वीट एक खो खो खिलाड़ी नसरीन को लेकर था। नसरीन विधायक के पास गई थी लेकिन मदद हो नहीं पायी। उनसेे कहा गया कि खेलकर वो एहसान नहीं करती। मैंने फोन पर बात की तो नसरीन ने बताया कि भारत के लिए मेडल जीती हैं। मेरा मानना है कि हम राशन देकर एहसान नहीं कर रहे हैं। उनहोंने भारत का मान रखा। बल्कि यह तो दुर्भाग्य है कि उन्हें राशन के लिए हाथ फैलाना पड़ा। वो बोली कि 14 सदस्यी परिवार है। वो कांट्रेक्ट पर नौकरी करती हे वो भी साल के तीन महीने की ही है। जिसमें 16 हजार रुपये ही मिलते हैं। पिता की बर्तन की दुकान है जो एक माह से बंद पड़ी है। मैंने 21 हजार रुपये की मदद की। स्मृति जी से बात हुई है, उन्होंने अगले महीने नौकरी दिलाने का भरोसा जताया है।
बग्गा कहते हैं कि मदद करके मानसिक खुशी मिलती है। यह समय थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन यदि हम सब मिलकर रहें तो अच्छा समय भी जल्द ही आएगा

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