इस पार्क का उद्घाटन दिसंबर 1911 में महाराज एड्वर्ड 7 के बेटे प्रिंस ऑफ वेल्स एड्वर्ड 8 ने भारत के अपने शाही दौरे में आल इंडिया किंग एड्वर्ड मेमोरियल के रूप में किया था। एड्वर्ड की पांच टन की विशाल प्रतिमा में महाराज घोड़े पर बैठे थे और उन्होंने फील्ड मार्शल की पूरी वर्दी पहन रखी है और बाएं हाथ में एक हैट पकड़ी हुई थी। इस प्रतिमा को लंदन में बकिंघम पैलेस के सामने क्वीन विक्टोरिमेमोरियल के डिजाइनर सर थॉमस ब्रॉक ने डिजाइन किया था। इसे इंग्लैंड से भारत लाया गया था। 

इतिहासकार आरवी स्मिथ बताते थे कि सन 1967 में इसे मूर्ति को हटाया गया था। बकौल स्मिथ उन दिनों वो वहीं रहतेे थे। प्रतिदिन पार्क पहुंच जाता था देखने के लिए। करीब सात दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद इस मूर्ति को निकाला जा सका था। यहां से निकाल इसे प्रगति मैदान में खुले मैदान में रखा गया था। भारत में ब्रितानिया हुकूमत के समापन के साथ ही एड्वर्ड पार्क की पहचान भी खो गई। यह पार्क अब सुभाष चंद्र बोस की देशभक्ति और आजाद भारत का प्रतीक बन गया है। वहीं फ्रेडरिक ब्रॉक की पुस्तक थॉमस ब्रॉक फोरगेटन स्कल्प्चर ऑफ द विक्टोरिया मेमोरियल के अनुसार इस प्रतिमा को 1969 में टोरंटो ले जाकर महारानी के पार्क में स्थापित किया गया। इस पार्क का उद्घाटन स्वयं एड्वर्ड 7 ने 1860 में किया था जब वह प्रिंस ऑफ वेल्स थे।

खुशनुमा यादों का साथी 

चांदनी चौक निवासी सुरेखा गुप्ता कहती हैं कि पार्क स्थानीय निवासियों की यादों में कैद है, और होगा भी क्यों नहीं। यहां से जुड़ी कई यादें आज भी जेहन में ताजा है। सन 1940 से 60 तक यहां लोग शाम होते ही बड़ी संख्या में आते थे। पार्क में मूर्ति के किनारे पॉम ट्री लगे हुए थे। इन पेड़ों को बाद में काट डाला गया। तब पार्क आम जनमानस में घोड़ेवाला पार्क, यादगार पार्क के नाम से ज्यादा मशहूर था। लोग मूर्ति के चारो तरफ बैठते थे एवं आजादी के संघर्ष समेत ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होती थी। नीचे पेपर बिछा उस पर कई खेल भी खेले जाते थे। 

देशभक्ति भावना से ओतप्रोत हुई सरजमीं 

23 जनवरी 1975 को यहां आइएनए से जुड़े सैकड़ों लोगों का जमावड़ा हुआ था। उसी दिन उपराष्ट्रपति बी डी जत्ती ने नेताजी की मूर्ति का अनावरण किया था। इतिहासकारों की मानें तो पार्क से चंद कदम की दूरी पर शाह वलीउल्लाह मदरसा और एक मस्जिद थी, जो अकबराबादी मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध थी। जामा मस्जिद के पूर्वी गेट और लाल किला के दिल्ली गेट के बीच खास बाजार नाम से एक भव्य बाजार भी था। यही नहीं आसपास रईसों के मकान बने हुए थे। बाजार उच्च वर्ग का पसंदीदा ठौर था। यहां स्थित दुकानें, बाजार, मकान आदि को 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने तहस नहस कर दिया। 

चांदनी चौक- द मुगल सिटी आफ ओल्ड दिल्ली किताब में इंटैक की कंवेनर स्वप्ना लिडले लिखती हैं कि लाल किला और जामा मस्जिद के बीच भव्य बाजार था। 1857 के विद्रोह की बलि कई ऐतिहासिक इमारतें एवं बाजार चढ़े। इनमें अकबराबादी मस्जिद भी शामिल था। ऐसा कहा जाता है कि इसी जगह पर सन 1922 में एडवर्ड पार्क बनाया गया। जिसे बाद में सुभाष पार्क, उर्दू पार्क, दंगल मैदान में बांटा गया। 

नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली को जोड़ता पार्क?

पवन शर्मा अपनी पुस्तक औपनिवेशिक विस्मरण में लिखते हैं कि जब लुटियंस दिल्ली की परिकल्पना साकार हुई तो एक बड़ा सवाल नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली को जोडऩे पर खड़ा हुआ। लुटियन ने दो रास्ते सुझाए थे। जिनमें से एक पर काम कर नई दिल्ली को पुरानी दिल्ली से जोड़ता रास्ता तैयार करना था। पहला, लाल किले से दिल्ली गेट होते हुए था। जबकि दूसरा जामा मस्जिद के पास से एडवर्ड पार्क होते हुए रेलवे स्टेशन तक निकालना था जबकि एक रास्ता कश्मीरी गेट की तरफ तक निकालने की भी योजना थी। 

आजादी के मतवालों का ठौर 

उर्दू पार्क स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों की रणनीतिक बैठकों का गवाह रहा है। इसी पार्क में 1 अगस्त, 1942 को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने स्थानीय युवा नेता मीर मुश्ताक अहमद के साथ महत्वपूर्ण बैठक की थी। ‘भारत छोड़ोÓ आंदोलन से अधिक से अधिक लोगों को जोडऩे के उद्देश्य से हुई इस बैठक में सैकड़ों लोगों ने भाग लिया था। मौलाना आजाद का इस पार्क से जुड़ाव होने के कारण 22 फरवरी 1958 को उनकी मौत के बाद उनकी मजार भी यहीं बनाई गई थी। बताया जाता है कि इस मजार को बनाने में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्थानीय निवासी राहुल कहते हैं कि यहां अबुल कलाम आजाद के अलावा जवाहर लाल नेहरू, मुल्तान के मौलाना अता उल्लाह शाह बुखारी, मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली भी समय-समय पर आजादी के आंदोलन संबंधी बैठकों में शामिल हुए। 

परदा पार्क की अनोखी कहानी

बकौल आरवी स्मिथ उर्दू पार्क के पास ही एक परदा पार्क भी है। इसके नाम के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। दरअसल, आजादी के पहले तक इस पार्क में सिर्फ महिलाएं आती थी। महिलाएं परदा की होती थी एवं यहां बेहिचक वो वॉकिंग कर सकती थी। परदा वाली महिलाओं के ज्यादा आने की वजह से इस पार्क का नाम ही परदा पार्क पड़ गया। इसी तरह हिंदी पार्क में महात्मा गांधी कई बार आए थे। सुरेखा गुप्ता कहती हैं कि विभिन्न आंदोलनों के संबंध में महात्मा गांधी यहां होने वाली बैठकों में आए थे। 

By open voice

श्रमजीवी पत्रकार। राजनीति, कला-संस्कृति,इतिहास में रूचि।

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