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उत्तर प्रदेश का सियासी पारा इन दिनों हाई है, और हो भी क्यों ना अगले साल विधानसभा के चुनाव जो होने हैं। यूपी विधानसभा चुनाव के मद्​देनजर सभी दल सोशल इंजीनियरिंग की राह पर निकल पड़े हैं। हिंदुुत्व का झंडा बुलंद कर चुनावी मैदान में कूदी भाजपा अब जातिगत समीकरण भी साधने में जुट गई है। इसी कड़ी में 75 जिलों में दलित-पिछड़ा सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई गई है। हालांकि इससे चुनावों में कितना फायदा मिलता है यह तो वक्त बताएगा, लेकिन बीजेपी के इस निर्णय ने सरगर्मी बढ़ा दी है।
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इन सम्मेलनों केे जरिए पिछड़ी और दलित जातियों के प्रमुख चेहरों के जरिए वोटों की घेराबंदी की जाएगी। भाजपा के प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल ने पार्टी के ओबीसी और अनुसूचित मोर्चा के पदाधिकारियों संग अलग-अलग बैठकें भी कीं।
पार्टी सूत्रों की मानें तो बीजेपी चुनाव जीतनेे के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। सोशल इंजीनियरिंग और बूथ प्रबंधन पर खासा जोर दिया जा रहा है। विगत महीने ही लखनऊ में विभिन्न जातियों के करीब ढाई दर्जन सम्मेलन आयोजित किए गए। 15 से 21 दिसंबर के बीच प्रदेश के लगभग सभी जिल में सम्मेलन होंगे। जिसमें आठ से दस हजार लोगों की भीड़ इक्टठा की जाएगी।

संगठन वालों को नहीं मिलेगा टिकट
बीजेपी ने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी संगठन से जुड़े किसी पदाधिकारी को टिकट नहीं मिलेगा। प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बसंल ने स्पष्ट किया कि जो लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी दावेदारी से पहले संगठन का पद छोड़ना होगा। बीजेपी पहले से इसकी हिमायती रही है।

By open voice

श्रमजीवी पत्रकार। राजनीति, कला-संस्कृति,इतिहास में रूचि।

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